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सूरज की पेशी!
अपने समय में हिन्दी के एक प्रमुख कवि और बच्चों की पत्रिका ‘पराग’ के संपादक रहे स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| नंदन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का यह नवगीत – आँखों में रंगीन नज़ारेसपने…
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लिबास-ए-हया भी उतर गया!
पहले भी बे-लिबास थे इतने मगर न थे, अब जिस्म से लिबास-ए-हया भी उतर गया| मुनव्वर राना
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मेरा गला भी उतर गया!
सच बोलने में नश्शा कई बोतलों का था, बस ये हुआ कि मेरा गला भी उतर गया| मुनव्वर राना
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ख़ाली हाथ तवा भी उतर गया!
वो मुफ़्लिसी के दिन भी गुज़ारे हैं मैंने जब, चूल्हे से ख़ाली हाथ तवा भी उतर गया| मुनव्वर राना
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रंग-ए-हिना भी उतर गया!
रो-धो के वो भी हो गया ख़ामोश एक रोज़, दो-चार दिन में रंग-ए-हिना भी उतर गया| मुनव्वर राना