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घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है!
घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया, घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है| राहत इंदौरी
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मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं!
वो मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं, जिन लोगों के पास सवारी रहती है| राहत इंदौरी
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हाथ पसारे जब ख़ुद्दारी रहती है!
पाँव कमर तक धँस जाते हैं धरती में, हाथ पसारे जब ख़ुद्दारी रहती है| राहत इंदौरी
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और मैं लाचार पति, निर्धन!
आज एक बार फिर से मैं, मेरे लिए बड़े भाई और गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में बेचैन जी ने निम्न मध्य वर्ग के एक साधारण व्यक्ति की मजबूरियों को उजागर किया है| बेचैन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की…
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मुझे ताज-ओ-तख़्त ख़ुदा न दे!
मैं ग़ज़ल की शबनमी आँख से ये दुखों के फूल चुना करूँ, मिरी सल्तनत मिरा फ़न रहे मुझे ताज-ओ-तख़्त ख़ुदा न दे| बशीर बद्र
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कहीं ग़म की आग घुला न दे!
मिरे साथ चलने के शौक़ में बड़ी धूप सर पे उठाएगा, तिरा नाक नक़्शा है मोम का कहीं ग़म की आग घुला न दे| बशीर बद्र
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मुझे इतनी सख़्त सज़ा न दे!
मैं उदासियाँ न सजा सकूँ कभी जिस्म-ओ-जाँ के मज़ार पर, न दिए जलें मिरी आँख में मुझे इतनी सख़्त सज़ा न दे| बशीर बद्र