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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 13th Sep 2022

    ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं!

    इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं, दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बा’द| कैफ़ी आज़मी

  • 13th Sep 2022

    ख़तरा-ए-दार-ओ-रसन तो है!

    एलान-ए-हक़ में ख़तरा-ए-दार-ओ-रसन तो है, लेकिन सवाल ये है कि दार-ओ-रसन के बा’द| कैफ़ी आज़मी

  • 13th Sep 2022

    ठंडी छाँव में याद आई उसकी धूप!

    ग़ुर्बत की ठंडी छाँव में याद आई उसकी धूप, क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बा’द| कैफ़ी आज़मी

  • 13th Sep 2022

    अक्सर घुटन के बा’द!

    होंटों को सी के देखिए पछ्ताइएगा आप, हंगामे जाग उठते हैं अक्सर घुटन के बा’द| कैफ़ी आज़मी

  • 13th Sep 2022

    चाँद से आगे निकल गए!

    दीवाना-वार चाँद से आगे निकल गए, ठहरा न दिल कहीं भी तिरी अंजुमन के बा’द| कैफ़ी आज़मी

  • 13th Sep 2022

    दाद-ए-सुख़न मिली मुझे-

    वो भी सराहने लगे अर्बाब-ए-फ़न के बा’द, दाद-ए-सुख़न मिली मुझे तर्क-ए-सुख़न के बा’द| कैफ़ी आज़मी

  • 13th Sep 2022

    पीछे जा रहा हूँ मैं!

    लंबे समय के बाद मैं आज एक बार फिर स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| एक समय था जब रंग जी को कवि सम्मेलनों में सुनना एक अलग ही प्रकार का अनुभव होता था| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का यह गीत – जो गए…

  • 12th Sep 2022

    आहों का ज़माना है!

    आग़ाज़-ए-मोहब्बत है आना है न जाना है, अश्कों की हुकूमत है आहों का ज़माना है| जिगर मुरादाबादी

  • 12th Sep 2022

    ठोकर में ज़माना है!

    क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है, हम ख़ाक-नशीनों की ठोकर में ज़माना है| जिगर मुरादाबादी

  • 12th Sep 2022

    रूह को भी मज़ा मोहब्बत का!

    रूह को भी मज़ा मोहब्बत का, दिल की हम-साएगी से मिलता है| जिगर मुरादाबादी

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