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न जीने का मज़ा होता!
अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता, न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता| चकबस्त बृज नारायण
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अहिंसा!
आज एक बार फिर मैं जनकवि बाबा नागार्जुन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में अहिंसा को एक भिखारिन के रूप में दर्शाया गया है| बाबा नागार्जुन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है जनकवि बाबा नागार्जुन जी की यह कविता – 105 साल…
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कर्णधार तू बना तो!
आज एक बार फिर से मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख नाम रहे स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता – कर्णधार तू…