Category: Uncategorized
-
गिला है जो भी किसी से
किसी का दर्द हो करते हैं तेरे नाम रक़म, गिला है जो भी किसी से तिरे सबब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
तिरा इंतिज़ार जब से है!
तिरी उमीद तिरा इंतिज़ार जब से है, न शब को दिन से शिकायत न दिन को शब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
स्मृतिकण!
आज मैं शायद पहली बार स्वर्गीय भगवतीचरण वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भगवतीचरण वर्मा जी अपने उपन्यासों के कारण अधिक प्रसिद्ध हुए थे, लेकिन वे अच्छे कवि भी थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भगवतीचरण वर्मा जी की यह कविता – क्या जाग रही होगी तुम भी?निष्ठुर-सी आधी रात प्रिये! अपना…
-
हम आबाद करते हैं!
मोहब्बत के चमन में मजमा-ए-अहबाब रहता है, नई जन्नत इसी दुनिया में हम आबाद करते हैं| बृज नारायण चकबस्त
-
बरबाद करते हैं!
नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं, वतन की आबरू अहल-ए-वतन बरबाद करते हैं| बृज नारायण चकबस्त
-
दिल का ये आलम है!
ख़ुदा को भूलकर इंसान के दिल का ये आलम है, ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता| बृज नारायण चकबस्त
-
इन आँखों से जुदा होता
रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी, क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता| बृज नारायण चकबस्त
-
बुतों की बेवफ़ाई पर!
हज़ारों जान देते हैं बुतों की बेवफ़ाई पर, अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता| बृज नारायण चकबस्त
-
जंगल हरा होता!
बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता, जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता| बृज नारायण चकबस्त