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जिसकी कभी ख़्वाहिश नहीं की!
जिस क़दर उससे त’अल्लुक़ था चला जाता है, उसका क्या रंज हो जिसकी कभी ख़्वाहिश नहीं की| अहमद फ़राज़
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उसने भी पुर्सिश नहीं की!
अहल-ए-महफ़िल पे कब अहवाल खुला है अपना, मैं भी ख़ामोश रहा उसने भी पुर्सिश* नहीं की|*पूछताछ अहमद फ़राज़
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होंठों ने जुम्बिश नहीं की!
सामने उसके कभी उसकी सताइश* नहीं की, दिल ने चाहा भी अगर होंठों ने जुम्बिश नहीं की|*प्रशंसा अहमद फ़राज़
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मुसाफिर जाएगा कहाँ!
आज काफी दिनों बाद एक फिल्मी गीत शेयर करने का मन हो रहा है | ऐसे ही इस गीत की पंक्तियाँ दोहराते हुए खयाल आया कि फिल्म- गाइड के लिए लिखे इस गीत में शैलेन्द्र जी ने कितनी सरल भाषा में जीवन दर्शन पिरो दिया है- कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी, पानी पे लिखी…
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मौसम को उस्ताद किया!
दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही, सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया| निदा फ़ाज़ली
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दोनों को बरबाद किया!
बात बहुत मा’मूली सी थी उलझ गई तकरारों में, एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बरबाद किया| निदा फ़ाज़ली
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हमने दिल को शाद किया!
बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में, छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हमने दिल को शाद किया| निदा फ़ाज़ली