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चाँदनी चुप-चाप!
आज अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चाँदनी रात को लेकर अज्ञेय जी की यह अपनी ही प्रकार की अभिव्यक्ति है| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी की यह कविता – चाँदनी चुप-चाप सारी रातसूने आँगन मेंजाल रचती रही।मेरी रूपहीन अभिलाषाअधूरेपन की मद्धिमआँच पर तँचती रही।व्यथा मेरी अनकहीआनन्द की…
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इसका नया इलाज भी हो!
बदल रहे हैं कई आदमी दरिंदों में, मरज़ पुराना है इसका नया इलाज भी हो| निदा फ़ाज़ली
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जो बदलता है वो समाज भी हो!
हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं, हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो| निदा फ़ाज़ली
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कुछ और काम-काज भी हो!
न करते शोर-शराबा तो और क्या करते, तुम्हारे शहर में कुछ और काम-काज भी हो| निदा फ़ाज़ली