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शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं क्यूँ है!
शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं क्यूँ है, निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है| मिर्ज़ा ग़ालिब
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काश पूछो कि मुद्दआ’ क्या है!
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ, काश पूछो कि मुद्दआ’ क्या है| मिर्ज़ा ग़ालिब
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आख़िर इस दर्द की दवा क्या है!
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है| मिर्ज़ा ग़ालिब
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अहेरी!
आज बारी है प्रसिद्ध कवि और नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की, आज मैं उनकी एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की यह कविता – नोकीले तीर हैं अहेरी केकांटे खटिमट्ठी झरबेरी केटांग चली शोखतार तार हुआ पल्लूअंगिया पर बैरी साभार हुआ पल्लूमीठे रस बैन गंडेरी केझरबेरी आंखों…
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समुंदर की ज़िम्मेदारी है!
मैं क़तरा हो के भी तूफ़ाँ से जंग लेता हूँ, मुझे बचाना समुंदर की ज़िम्मेदारी है| वसीम बरेलवी