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इश्क़ की है कोई इंतिहा कि ये!
नैरंग-ए-इश्क़ की है कोई इंतिहा कि ये, ये ग़म कहाँ कहाँ ये मसर्रत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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अब तो हैं परछाइयाँ तिरी!
दिल के उफ़क़ तक अब तो हैं परछाइयाँ तिरी, ले जाए अब तो देख ये वहशत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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छोड़ दिया दिल का साथ भी!
राह-ए-तलब में छोड़ दिया दिल का साथ भी, फिरते लिए हुए ये मुसीबत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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हुईं मंज़िलें तमाम!
बेताबी-ओ-सुकूँ की हुईं मंज़िलें तमाम, बहलाएँ तुझ से छुट के तबीअ’त कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ!
आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ, उफ़ ले गई है मुझ को मोहब्बत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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आह! वेदना मिली विदाई!
एक बार फिर मैं आज छायावाद युग के स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| हिन्दी कविता के लिए प्रसाद जी का योगदान अमूल्य है, विशेष रूप से उनके महाकाव्य- ‘कामायनी’, ‘आँसू’ आदि| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह कविता – आह! वेदना मिली विदाईमैंने भ्रमवश…
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अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है!
सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं, अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है| मिर्ज़ा ग़ालिब