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अजब तमाशा – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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हम बे-क़ुसूर लोग भी!
हम बे-क़ुसूर लोग भी दिलचस्प लोग हैं, शर्मिंदा हो रहे हैं ख़ता के बग़ैर भी| मुनव्वर राना
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वफ़ा के बग़ैर भी!
बरसों से इस मकान में रहते हैं चंद लोग, इक दूसरे के साथ वफ़ा के बग़ैर भी| मुनव्वर राना
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दुआ के बग़ैर भी!
साँसों का कारोबार बदन की ज़रूरतें, सब कुछ तो चल रहा है दुआ के बग़ैर भी| मुनव्वर राना
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दवा के बग़ैर भी!
अच्छी से अच्छी आब-ओ-हवा के बग़ैर भी, ज़िंदा हैं कितने लोग दवा के बग़ैर भी| मुनव्वर राना
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दिलों में फ़ासले!
बड़ी मुश्किल से आते हैं समझ में लखनऊ वाले, दिलों में फ़ासले लब पर मगर आदाब रहता है| मुनव्वर राना
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इन्ही लोगों के दम से है
हमारी हर परेशानी इन्ही लोगों के दम से है, हमारे साथ ये जो हल्क़ा-ए-अहबाब रहता है| मुनव्वर राना
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ये सोने की दुकानें हैं!
ये बाज़ार-ए-हवस है तुम यहाँ कैसे चले आए, ये सोने की दुकानें हैं यहाँ तेज़ाब रहता है| मुनव्वर राना
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यूनिफार्म में बच्चे!
भले लगते हैं स्कूलों की यूनिफार्म में बच्चे, कँवल के फूल से जैसे भरा तालाब रहता है| मुनव्वर राना
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सैलाब रहता है|
हज़ारों बस्तियाँ आ जाएँगी तूफ़ान की ज़द में, मिरी आँखों में अब आँसू नहीं सैलाब रहता है| मुनव्वर राना