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आग लगी हो तो अपने घर में रहो!
जला न लो कहीं हमदर्दियों में अपना वजूद, गली में आग लगी हो तो अपने घर में रहो| राहत इन्दौरी
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कभी दिल कभी नज़र में रहो!
कभी दिमाग़ कभी दिल कभी नज़र में रहो, ये सब तुम्हारे ही घर हैं किसी भी घर में रहो| राहत इन्दौरी
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किताबों की तरह पढ़ने लगे!
एक इक पल को किताबों की तरह पढ़ने लगे, उम्र भर जो न किया हम ने वो अब करते हैं| राहत इन्दौरी
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मगर बात ही कब करते हैं!
ख़ुद को पत्थर सा बना रक्खा है कुछ लोगों ने, बोल सकते हैं मगर बात ही कब करते हैं| राहत इन्दौरी
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उसे धुन है मसीहाई की!
देखिए जिसको उसे धुन है मसीहाई की, आज कल शहर के बीमार मतब* करते हैं|*इलाज राहत इन्दौरी
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कोई हुक्म नहीं चलता है!
हम पे हाकिम का कोई हुक्म नहीं चलता है, हम क़लंदर हैं शहंशाह लक़ब* करते हैं|*योग्यता राहत इन्दौरी
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सूरज की है जितनी अज़्मत!
आपकी नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत, हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं| राहत इन्दौरी
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कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं!
काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं, और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं| राहत इन्दौरी
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पहेलियाँ!
आज कुछ अलग करते हैं, आज खड़ी बोली के प्रारंभिक कवियों में गिने जाने वाले अमीर खुसरो जी की लिखी कुछ पहेलियाँ शेयर कर रहा हूँ, इनका आनंद लीजिए– तरवर से इक तिरिया उतरी उसने बहुत रिझायाबाप का उससे नाम जो पूछा आधा नाम बतायाआधा नाम पिता पर प्यारा बूझ पहेली मोरीअमीर ख़ुसरो यूँ कहेम…
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ये कलाम किसका कलाम है!
कोई नग़्मा धूप के गाँव सा कोई नग़्मा शाम की छाँव सा, ज़रा इन परिंदों से पूछना ये कलाम किसका कलाम है| बशीर बद्र