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यहाँ कितने बहाने निकले!
कारोबार-ए-रसन-ओ-दार की तशहीर हुई, सरफ़रोशी के यहाँ कितने बहाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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सनद हम जो दिखाने निकले!
अपने घर संग-ए-मलामत की हुई है बारिश, बे-गुनाही की सनद हम जो दिखाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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शहर-ए-निगाराँ को जलाने निकले!
देखना ये है ठहरता है कहाँ जोश-ए-जुनूँ, सर-फिरे शहर-ए-निगाराँ को जलाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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उन्हें भी तो चुराने निकले!
ख़्वाब तो ख़्वाब थे आँखों में कहाँ रुक जाते, वो दबे पाँव उन्हें भी तो चुराने निकले| रज़ा अमरोहवी
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कई और फ़साने निकले!
दिल में झाँका तो बहुत ज़ख़्म पुराने निकले, इक फ़साने से कई और फ़साने निकले| रज़ा अमरोहवी
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डूब गया दिन
लंबे समय के बाद आज मैं एक बार फिर हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत मुझे अत्यंत प्रिय है- ‘यात्रा के बाद भी पथ साथ रहते हैं’| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत – डूब…