Category: Uncategorized
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लिबास-ए-हया भी उतर गया!
पहले भी बे-लिबास थे इतने मगर न थे, अब जिस्म से लिबास-ए-हया भी उतर गया| मुनव्वर राना
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मेरा गला भी उतर गया!
सच बोलने में नश्शा कई बोतलों का था, बस ये हुआ कि मेरा गला भी उतर गया| मुनव्वर राना
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ख़ाली हाथ तवा भी उतर गया!
वो मुफ़्लिसी के दिन भी गुज़ारे हैं मैंने जब, चूल्हे से ख़ाली हाथ तवा भी उतर गया| मुनव्वर राना
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रंग-ए-हिना भी उतर गया!
रो-धो के वो भी हो गया ख़ामोश एक रोज़, दो-चार दिन में रंग-ए-हिना भी उतर गया| मुनव्वर राना
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आरज़ू में परेशाँ है ज़िंदगी!
बेकस की आरज़ू में परेशाँ है ज़िंदगी, अब तो फ़सील-ए-जाँ से दिया भी उतर गया| मुनव्वर राना
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टूट जाऊँगा जो ज़रा भी उतर गया!
रुख़्सत का वक़्त है यूँही चेहरा खिला रहे, मैं टूट जाऊँगा जो ज़रा भी उतर गया| मुनव्वर राना
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क़र्ज़ मिरा भी उतर गया!
वो मुतमइन बहुत है मिरा साथ छोड़कर, मैं भी हूँ ख़ुश कि क़र्ज़ मिरा भी उतर गया| मुनव्वर राना
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मेरा नशा भी उतर गया!
अच्छा हुआ कि मेरा नशा भी उतर गया, तेरी कलाई से ये कड़ा भी उतर गया| मुनव्वर राना
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मीत, तुम जगते रहना!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के सुरीले गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी के कुछ गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – गाऊँ जब तक गीत मीत, तुम जगते रहनातुम मूंदोगे पलक तमिस्रा…
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सर झुका के गुज़रने लगा हूँ मैं!
दिल्ली कहाँ गईं तिरे कूचों की रौनक़ें, गलियों से सर झुका के गुज़रने लगा हूँ मैं| जाँ निसार अख़्तर