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घट!
आज हिन्दी साहित्य के एक विराट व्यक्तित्व स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में एक तरह से एक मटका अपनी मालकिन- पनिहारिन से अपने मनोभाव व्यक्त कर रहा है| अज्ञेय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है अज्ञेय जी…
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ख़्वाब ये देखा है क़ैद-ख़ाने में!
हमीं हैं गुल हमीं बुलबुल हमीं हवा-ए-चमन, ‘फ़िराक़’ ख़्वाब ये देखा है क़ैद-ख़ाने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दास्ताँ थी निहाँ तेरे आँख उठाने में!
उसी की शरह है ये उठते दर्द का आलम, जो दास्ताँ थी निहाँ तेरे आँख उठाने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
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जान पड़ गई हसरत भरे फ़साने में!
किसी की हालत-ए-दिल सुन के उठ गईं आँखें, कि जान पड़ गई हसरत भरे फ़साने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
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हासिल यही है जलने का!
बयान-ए-शम्अ है हासिल यही है जलने का, फ़ना की कैफ़ियतें देख झिलमिलाने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
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बहार थी बुलबुल तिरे तराने में!
ये गुल खिले हैं कि चोटें जिगर की उभरी हैं, निहाँ बहार थी बुलबुल तिरे तराने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
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जो रुस्वा न हो ज़माने में!
वो कोई रंग है जो उड़ न जाए ऐ गुल-ए-तर, वो कोई बू है जो रुस्वा न हो ज़माने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दर्द भरा था मिरे फ़साने में!
‘फ़िराक़’ दौड़ गई रूह सी ज़माने में, कहाँ का दर्द भरा था मिरे फ़साने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
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नाम उछलता रहा ज़माने में!
कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में, जुनूँ का नाम उछलता रहा ज़माने में| फ़िराक़ गोरखपुरी