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छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं!
धूप इतनी कराहती क्यूँ है, छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं| राहत इंदौरी
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क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं!
रोज़ हम इक अँधेरी धुंद के पार, क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं| राहत इंदौरी
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ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं!
नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है, ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं| राहत इंदौरी
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घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है!
घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया, घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है| राहत इंदौरी
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मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं!
वो मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं, जिन लोगों के पास सवारी रहती है| राहत इंदौरी
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हाथ पसारे जब ख़ुद्दारी रहती है!
पाँव कमर तक धँस जाते हैं धरती में, हाथ पसारे जब ख़ुद्दारी रहती है| राहत इंदौरी
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और मैं लाचार पति, निर्धन!
आज एक बार फिर से मैं, मेरे लिए बड़े भाई और गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में बेचैन जी ने निम्न मध्य वर्ग के एक साधारण व्यक्ति की मजबूरियों को उजागर किया है| बेचैन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की…