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किसे दुनिया ने पहनाया न था!
वो पयम्बर हो कि आशिक़ क़त्ल-गाह-ए-शौक़ में, ताज काँटों का किसे दुनिया ने पहनाया न था| क़तील शिफ़ाई
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कोई भी सरमाया न था!
हो गए क़ल्लाश जब से आस की दौलत लुटी, पास अपने और तो कोई भी सरमाया न था| क़तील शिफ़ाई
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कोई हम-साया न था!
ख़ूब रोए छुप के घर की चार-दीवारी में हम, हाल-ए-दिल कहने के क़ाबिल कोई हम-साया न था| क़तील शिफ़ाई
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इस क़दर हमने सुकूँ पाया न था!
उफ़ ये सन्नाटा कि आहट तक न हो जिसमें मुख़िल, ज़िंदगी में इस क़दर हमने सुकूँ पाया न था| क़तील शिफ़ाई
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क्या हमने समझाया न था!
क्या मिला आख़िर तुझे सायों के पीछे भागकर, ऐ दिल-ए-नादाँ तुझे क्या हमने समझाया न था| क़तील शिफ़ाई
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यूँ तो पहले हमको तरसाया न था!
सुर्ख़ आहन पर टपकती बूँद है अब हर ख़ुशी, ज़िंदगी ने यूँ तो पहले हमको तरसाया न था| क़तील शिफ़ाई
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थे बादल और कहीं साया न था!
दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था, इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था| क़तील शिफ़ाई
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ओज़ोन लेयर!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि और श्रेष्ठ मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक लंबी कविता शेयर कर रहा हूँ| आज की रचना में उन्होंने आज के जीवन की अनेक प्रकार की विसंगतियों का विवरण दिया है| चक्रधर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत…