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तुम्हीं को दोष दूँगी ऐ नज़ारो!
तुम्हीं से दिल ने सीखा है तड़पना, तुम्हीं को दोष दूँगी ऐ नज़ारो| कैफ़ी आज़मी
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हवा ने बुझाए हैं क्या क्या!
कहीं अँधेरे से मानूस हो न जाए अदब, चराग़ तेज़ हवा ने बुझाए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी
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दीवाने आए हैं क्या क्या!
उठा के सर मुझे इतना तो देख लेने दे, कि क़त्ल-गाह में दीवाने आए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी
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धूप ने तलवे जलाए हैं क्या क्या!
छटा जहाँ से उस आवाज़ का घना बादल, वहीं से धूप ने तलवे जलाए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी
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ज़ख़्म- मुस्कुराए हैं क्या क्या!
जब उसने हार के ख़ंजर ज़मीं पे फेंक दिया, तमाम ज़ख़्म-ए-जिगर मुस्कुराए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी
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हम लड़खड़ाए हैं क्या क्या!
कहीं से लौट के हम लड़खड़ाए हैं क्या क्या, सितारे ज़ेर-ए-क़दम रात आए हैं क्या क्या| कैफ़ी आज़मी
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हम!
आज फिर से मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी कवि और प्रसिद्ध उच्च अधिकारी रहे श्री अशोक वाजपेयी जी की एक लंबी कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक जी का किसी समय भारत सरकार की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक नीति को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा था| वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की…
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कोई भी फूल मुरझाया न था!
सिर्फ़ ख़ुश्बू की कमी थी ग़ौर के क़ाबिल ‘क़तील’, वर्ना गुलशन में कोई भी फूल मुरझाया न था| क़तील शिफ़ाई
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वो पहले तो नज़र आया न था!
अब खुला झोंकों के पीछे चल रही थीं आँधियाँ, अब जो मंज़र है वो पहले तो नज़र आया न था| क़तील शिफ़ाई