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तेरी गली से गुज़रने लगते हैं!
हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है, जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तुम्हें याद करने लगते हैं!
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं, किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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कटती फसलों के साथ!
अपने समय में हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी का एक नवगीत मैं आज शेयर कर रहा हूँ| ठाकुरप्रसाद सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी का यह नवगीत – कटती फसलों के साथ कट गया सन्नाटाबजती फसलों…
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दाता हो तो ऐसा हो!
हमने यही माँगा था उसने यही बख़्शा है, बंदा हो तो ऐसा हो दाता हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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चुभता हो तो ऐसा हो!
इस दर्द में क्या क्या है रुस्वाई भी लज़्ज़त भी, काँटा हो तो ऐसा हो चुभता हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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अपना हो तो ऐसा हो!
वो भी रहा बेगाना हमने भी न पहचाना, हाँ ऐ दिल-ए-दीवाना अपना हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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वो बैठा भी धोका हो तो ऐसा हो!
हमसे नहीं रिश्ता भी हमसे नहीं मिलता भी, है पास वो बैठा भी धोका हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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होना हो तो ऐसा हो!
दरिया ब-हुबाब-अंदर तूफ़ाँ ब-सहाब-अंदर, महशर ब-हिजाब-अंदर होना हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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रुस्वा हो तो ऐसा हो!
ऐ क़ैस-ए-जुनूँ-पेशा ‘इंशा’ को कभी देखा, वहशी हो तो ऐसा हो रुस्वा हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा
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सिमटा हो तो ऐसा हो!
इक ख़ाल-ए-सुवैदा में पहनाई-ए-दो-आलम, फैला हो तो ऐसा हो सिमटा हो तो ऐसा हो| इब्न-ए-इंशा