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चुप बैठे देख लेता हूँ!
कभी दिल में उदासी हो तो उनमें जा निकलता हूँ, पुराने दोस्तों को चुप से बैठे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी
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चुप बैठे देख लेता हूँ!
कभी दिल में उदासी हो तो उनमें जा निकलता हूँ, पुराने दोस्तों को चुप से बैठे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी
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ये तमाशे देख लेता हूँ!
थके लोगों को मजबूरी में चलते देख लेता हूँ, मैं बस की खिड़कियों से ये तमाशे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी
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तोड़ो!
अपने समय के एक प्रमुख कवि और दिनमान जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की यह कविता – तोड़ो तोड़ो तोड़ोये पत्थर ये चट्टानेंये झूठे बंधन टूटेंतो धरती का हम जानेंसुनते हैं मिट्टी में…
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कलाम तक न पहुँचे!
वही इक ख़मोश नग़्मा है ‘शकील’ जान-ए-हस्ती, जो ज़बान पर न आए जो कलाम तक न पहुँचे| शकील बदायूनी
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बाम तक न पहुँचे!
जो नक़ाब-ए-रुख़ उठा दी तो ये क़ैद भी लगा दी, उठे हर निगाह लेकिन कोई बाम तक न पहुँचे| शकील बदायूनी
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सलाम तक न पहुँचे!
ये अदा-ए-बे-नियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारक, मगर ऐसी बे-रुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुँचे|
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शाम तक न पहुँचे!
नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है, ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे|
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प्रेम पर कविता – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…