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पानी के अंदर देखिए!
पुर-सुकूँ लगती है कितनी झील के पानी पे बत, पैरों की बे-ताबियाँ पानी के अंदर देखिए| *बतख जावेद अख़्तर
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कल जहाँ दीवार थी!
कल जहाँ दीवार थी है आज इक दर देखिए, क्या समाई थी भला दीवाने के सर देखिए| जावेद अख़्तर
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आँखों में रेत प्यास!
आज मैं अपने एक अग्रज और हिन्दी नवगीत को प्रतिष्ठा दिलाने में एक अग्रणी भूमिका निभाने वाले स्वर्गीय देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय इन्द्र जी से मुझे बहुत स्नेह प्राप्त हुआ था और मैं सामान्यतः जो मेरे अधिक निकट रहे हैं उनकी रचनाएं शेयर नहीं करता हूँ| लीजिए…
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चाँद ने बात कराई भी!
कल साहिल पर लेटे लेटे कितनी सारी बातें कीं, आप का हुंकारा न आया चाँद ने बात कराई भी| गुलज़ार
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शब पहनाई भी!
कितनी जल्दी मैली करता है पोशाकें रोज़ फ़लक, सुब्ह ही रात उतारी थी और शाम को शब पहनाई भी| गुलज़ार