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बज़्म में लाती है हमें!
ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें, ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें| शहरयार
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अज़ल से इंतिज़ार है!
न जिसका नाम है कोई न जिसकी शक्ल है कोई, इक ऐसी शय का क्यूँ हमें अज़ल से इंतिज़ार है| शहरयार
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हर एक दिल फ़िगार है!
हर एक जिस्म रूह के अज़ाब से निढाल है, हर एक आँख शबनमी हर एक दिल फ़िगार है| शहरयार
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ग़ुबार ही ग़ुबार है!
ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है, हद-ए-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है| शहरयार
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बहुत देर तक सोए!
लीजिए आज बार फिर से प्रस्तुत है अपने जमाने में काव्य मंचों के एक प्रमुख नाम रहे स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की एक कविता| सरोज जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की यह कविता – सचमुच बहुत देर तक सोएइधर यहाँ…
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हँसने हँसाने से रही!
शहर में सबको कहाँ मिलती है रोने की जगह, अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही| निदा फ़ाज़ली
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चाँद बना देता है!
फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को, दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही| निदा फ़ाज़ली
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ठोकर ही उजाला देगी!
इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी, रात जंगल में कोई शम्अ जलाने से रही| निदा फ़ाज़ली
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तस्वीर बनाने से रही!
चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर* आँखें, ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही| *चित्रकार निदा फ़ाज़ली
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दोस्ती अपनी भी!
दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही, दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही| निदा फ़ाज़ली