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मेरा निशाँ कोई न हो!
जा कर कहीं खो जाऊँ मैं नींद आए और सो जाऊँ मैं, दुनिया मुझे ढूँडे मगर मेरा निशाँ कोई न हो| मजरूह सुल्तानपुरी
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ना-मेहरबाँ कोई न हो!
ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो, अपना पराया मेहरबाँ ना-मेहरबाँ कोई न हो| मजरूह सुल्तानपुरी
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रोशनी के लिए!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी नवगीत के शिखर पुरूष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी के कुछ नवगीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – यों अँधेरा अभी पी रहा हूँ, रोशनी…
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और बेहतर देखिए!
अक़्ल ये कहती दुनिया मिलती है बाज़ार में, दिल मगर ये कहता है कुछ और बेहतर देखिए| जावेद अख़्तर
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अंदर कि बाहर देखिए!
ज़ेहन-ए-इंसानी इधर ‘आफ़ाक़ की वुसअत’* उधर, एक मंज़र है यहाँ अंदर कि बाहर देखिए| *दुनिया का फैलाव जावेद अख़्तर
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अब मैं कोई और हूँ!
छोड़ कर जिस को गए थे आप कोई और था, अब मैं कोई और हूँ वापस तो आकर देखिए| जावेद अख़्तर