Category: Uncategorized
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ये चराग़ तू ही बुझा न दे!
मेरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी, मुझे डर है ऐ मिरे चारा-गर ये चराग़ तू ही बुझा न दे| शकील बदायूनी
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मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे!
मेरे हम-नफ़स मेरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे, मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-ब-लब मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे| शकील बदायूनी
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तमसो मा ज्योतिर्गमय!
हिन्दी नवगीत के शलाका पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत मैं आज शेयर कर रहा हूँ| नवगीत के मामले में शंभुनाथ सिंह जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – बुझी न दीप…
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कितने दिन इतराओगे!
‘फ़ैज़’ दिलों के भाग में है घर भरना भी लुट जाना भी, तुम इस हुस्न के लुत्फ़-ओ-करम पर कितने दिन इतराओगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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उनको क्या जतलाओगे!
किसने वस्ल का सूरज देखा किस पर हिज्र की रात ढली, गेसुओं वाले कौन थे क्या थे उनको क्या जतलाओगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हमसे क्या मनवाओगे!
अहद-ए-वफ़ा या तर्क-ए-मोहब्बत जो चाहो सो आप करो, अपने बस की बात ही क्या है हमसे क्या मनवाओगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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कब बरखा बरसाओगे!
बीता दीद उम्मीद का मौसम ख़ाक उड़ती है आँखों में, कब भेजोगे दर्द का बादल कब बरखा बरसाओगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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कब तक याद न आओगे!
कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे, कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दिल में सितारे उतरने लगते हैं!
दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है, तो ‘फ़ैज़’ दिल में सितारे उतरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं!
वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी*, फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं|Speaking in style फ़ैज़ अहमद फ़ैज़