Category: Uncategorized
-
काएनात बन के उभरने लगा हूँ मैं!
ये मेहर-ओ-माह अर्ज़-ओ-समा मुझ में खो गए, इक काएनात बन के उभरने लगा हूँ मैं| जाँ निसार अख़्तर
-
मेरा सुधरना मुहाल था!
ऐ चश्म-ए-यार मेरा सुधरना मुहाल था, तेरा कमाल है कि सुधरने लगा हूँ मैं| जाँ निसार अख़्तर
-
आज बिखरने लगा हूँ मैं!
हर आन टूटते ये अक़ीदों* के सिलसिले, लगता है जैसे आज बिखरने लगा हूँ मैं|*Faith जाँ निसार अख़्तर
-
फ़र्ज़ भी करने लगा हूँ मैं!
पहले हक़ीक़तों ही से मतलब था और अब, एक आध बात फ़र्ज़ भी करने लगा हूँ मैं| जाँ निसार अख़्तर
-
हद से गुज़रने लगा हूँ मैं!
ऐ दर्द-ए-इश्क़ तुझसे मुकरने लगा हूँ मैं, मुझको संभाल हद से गुज़रने लगा हूँ मैं| जाँ निसार अख़्तर
-
अपने आपको तन्हा किया न जाए!
हम हैं तिरा ख़याल है तेरा जमाल है, इक पल भी अपने आपको तन्हा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
-
आप को रुस्वा किया न जाए!
अच्छा है उनसे कोई तक़ाज़ा किया न जाए, अपनी नज़र में आप को रुस्वा किया न जाए| जाँ निसार अख़्तर
-
शब्दों से परे!
आज फिर से मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मन में पलती पीड़ाओं को मिश्र जी ने इस गीत में सुंदर अभिव्यक्ति दी है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह नवगीत – शब्दों से परे-परेमन के घन भरे-भरे वर्षा…
-
सोया भी नहीं था कि जगाने निकले!
वो सितम-केश बहर-ए-हाल सितम-केश रहे, दर्द सोया भी नहीं था कि जगाने निकले| रज़ा अमरोहवी
-
यादों के ख़ज़ाने निकले!
जिन किताबों पे सलीक़े से जमी वक़्त की गर्द, उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले| रज़ा अमरोहवी