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हैवान यहाँ भी है वहाँ भी!
इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी, अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहाँ भी| निदा फ़ाज़ली
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लहू तो तीर कमानों में बट गया!
ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं, ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया| निदा फ़ाज़ली
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चंद मचानों में बट गया!
हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ, आलम तमाम चंद मचानों में बट गया| निदा फ़ाज़ली
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वो चंद मकानों में बट गया!
जब तक था आसमान में सूरज सभी का था, फिर यूँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया| निदा फ़ाज़ली
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वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया!
पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की, बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया| निदा फ़ाज़ली
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शहर में तो दुकानों में बट गया!
इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था, उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया| निदा फ़ाज़ली
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सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया!
गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया, होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया| निदा फ़ाज़ली
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गीत गुणनफल के!
स्वर्गीय रमेश रंजक जी अत्यंत समर्थ नवगीतकार थे जिन्होंने कुछ कालजयी नवगीत लिखे हैं| मैंने पहले भी रंजक जी की कुछ रचनाएं शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक और नवगीत – गीत गुणनफल केसम्बोधन कल केडूब गए धार में फिसल के मछली थी बाँह की प्रियाक्यों मन को…
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गलियाँ बड़ी सुनसान हैं आए कोई!
कोई आहट कोई आवाज़ कोई चाप नहीं, दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान हैं आए कोई| परवीन शाकिर
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उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई!
अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं, अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई| परवीन शाकिर