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फूलों को किताबों में न रक्खे कोई!
मैं तो उस दिन से हिरासाँ हूँ कि जब हुक्म मिले, ख़ुश्क फूलों को किताबों में न रक्खे कोई| परवीन शाकिर
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न कभी टूट के बिखरे कोई!
जिस तरह ख़्वाब मिरे हो गए रेज़ा रेज़ा, उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई| परवीन शाकिर
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तिरा नाम न पढ़ ले कोई!
काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में, मेरे चेहरे पे तिरा नाम न पढ़ ले कोई| परवीन शाकिर
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बिखरने से न रोके कोई!
अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई, और बिखर जाऊँ तो मुझको न समेटे कोई| परवीन शाकिर
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क्या मुझको बहाल कर दिया!
मुद्दतों बा’द उसने आज मुझसे कोई गिला किया, मंसब-ए-दिलबरी पे क्या मुझको बहाल कर दिया| परवीन शाकिर
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ख़्वाब ओ ख़याल कर दिया!
चेहरा ओ नाम एक साथ आज न याद आ सके, वक़्त ने किस शबीह को ख़्वाब ओ ख़याल कर दिया| परवीन शाकिर
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वाक़िफ़-ए-हाल कर दिया!
मेरे लबों पे मोहर थी पर मेरे शीशा-रू ने तो, शहर के शहर को मिरा वाक़िफ़-ए-हाल कर दिया| परवीन शाकिर
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इश्क़ के इस सफ़र ने तो!
चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया, इश्क़ के इस सफ़र ने तो मुझ को निढाल कर दिया| परवीन शाकिर
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पेड़ कटते वक़्त!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के सृजनधर्मी नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| श्री बुदधिनाथ जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए अब प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह सुंदर नवगीत – शब्द मुझसे पूछ बैठा आज तुम मेरी कीमत समझते…
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ठिकाने के दिन आ रहे हैं!
चलो ‘फ़ैज़’ फिर से कहीं दिल लगाएँ, सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़