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बद-दुआ लगे है मुझे!
हर एक रूह में इक ग़म छुपा लगे है मुझे, ये ज़िंदगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
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एक चाय की चुस्की!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि एवं गीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मालवीय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की यह रचना – एक चाय की चुस्कीएक कहकहाअपना तो इतना सामान ही रहा । चुभन…
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इतने यक़ीं से हमने!
कुछ समझ कर ही ख़ुदा तुझ को कहा है वर्ना, कौन सी बात कही इतने यक़ीं से हमने| जाँ निसार अख़्तर
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प्यार लेकिन किया है!
यूँ तो एहसान हसीनों के उठाए हैं बहुत, प्यार लेकिन जो किया है तो तुम्हीं से हमने| जाँ निसार अख़्तर
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सुनाई है वहीं से हमने!
जिस जगह पहले-पहल नाम तिरा आता है, दास्ताँ अपनी सुनाई है वहीं से हमने| जाँ निसार अख़्तर
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दीवाना बने फिरते थे!
वो भी क्या दिन थे कि दीवाना बने फिरते थे, सुन लिया था तिरे बारे में कहीं से हमने| जाँ निसार अख़्तर
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शिकनों को चुना!
हौसला खो न दिया तेरी नहीं से हमने, कितनी शिकनों को चुना तेरी जबीं से हमने| जाँ निसार अख़्तर
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खंडहर के प्रति!
आज एक बार फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ , छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता, जिन्होंने हमें ‘राम की शक्ति पूजा’ जैसी कुछ अमर रचनाएं हमें दी हैं| निराला जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी…
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करता नहीं हूँ मैं!
उन कामों की बनाता हूँ फ़िहरिस्त बार बार, जो काम मुझको करने हैं करता नहीं हूँ मैं| राजेश रेड्डी
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सँवरता नहीं हूँ मैं!
पहचान ही न पाऊँ ख़ुद अपने ही अक्स को, इतना भी आइने में सँवरता नहीं हूँ मैं| राजेश रेड्डी