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नए अरमाँ सजाने में!
कोई टूटे हुए शीशे लिए अफ़्सुर्दा-ओ-मग़्मूम, कब तक यूँ गुज़ारे बे-तलब बे-आरज़ू दिन, तो इन ख़्वाबों की किर्चें हम ने पलकों से झटक दीं पर, नए अरमाँ सजाने में अभी कुछ दिन लगेंगे| जावेद अख़्तर
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अभी कुछ दिन लगेंगे!
कभी हमको यक़ीं था ज़ो’म था दुनिया हमारी जो मुख़ालिफ़ है तो हो जाए, मगर तुम मेहरबाँ हो, हमें ये बात वैसे याद तो अब क्या है लेकिन, हाँ इसे यकसर भुलाने में अभी कुछ दिन लगेंगे| जावेद अख़्तर
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अभी कुछ दिन लगेंगे!
ज़रा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाख़ों पर, नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे, बहुत से ज़र्द चेहरों पर ग़ुबार-ए-ग़म है कम बे-शक, पर उनको मुस्कुराने में अभी कुछ दिन लगेंगे| जावेद अख़्तर
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प्यार तुम्हें दे सकता हूँ!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि, जो राजनेता भी हैं, सांसद रहे हैं और संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य भी रहे हैं, ऐसे श्री उदयप्रताप सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| श्री उदयप्रताप सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…
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फ़ासला लगे है मुझे!
अब एक आध क़दम का हिसाब क्या रखिए, अभी तलक तो वही फ़ासला लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
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ख़ौफ़ सा लगे है मुझे!
न जाने वक़्त की रफ़्तार क्या दिखाती है, कभी कभी तो बड़ा ख़ौफ़ सा लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
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पहचानता लगे है मुझे!
मैं सोचता था कि लौटूँगा अजनबी की तरह, ये मेरा गाँव तो पहचानता लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
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तो बुरा लगे है मुझे!
मैं जब भी उसके ख़यालों में खो सा जाता हूँ, वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
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झाँकता लगे है मुझे
मैं सो भी जाऊँ तो क्या मेरी बंद आँखों में, तमाम रात कोई झाँकता लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
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कभी रात भीग जाती है
जो आँसुओं में कभी रात भीग जाती है, बहुत क़रीब वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर