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नसीबों की तरह तू!
मुँह फेर के जाना है तुझे जा तिरी मर्ज़ी, मत रूठ मगर मुझ से नसीबों की तरह तू| राजेश रेड्डी
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उमीदों की तरह तू!
चाहा था बहुत मैंने भुला दूँ तुझे लेकिन, जाता ही नहीं दिल से उमीदों की तरह तू| राजेश रेड्डी
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मिरी नींदों की तरह तू!
सुख-चैन मिरा लूटने वाले आ किसी दिन, मुझको भी चुरा ले मिरी नींदों की तरह तू| राजेश रेड्डी
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तिरी यादों की तरह तू!
ऐसे न बिछड़ आँखों से अश्कों की तरह तू, आ लौट के आ फिर तिरी यादों की तरह तू| राजेश रेड्डी
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शाख़ फल तो सकती है
हुई है गर्म लहु पी के इश्क़ की तलवार, यूँ ही जिलाए जा ये शाख़ फल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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बात खल तो सकती है!
जो तूने तर्क-ए-मोहब्बत को अहल-ए-दिल से कहा, हज़ार नर्म हो ये बात खल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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पिघल तो सकती है!
सुना है बर्फ़ के टुकड़े हैं दिल हसीनों के, कुछ आँच पा के ये चाँदी पिघल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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आत्मकथ्य!
आज एक बार फिर से मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, प्रसाद जी की रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह रचना – मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह,मुरझाकर गिर रहीं…
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सँभल तो सकती है
तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और, कि गिरते गिरते भी दुनिया सँभल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी