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वन-वन, उपवन!
एक बार फिर मैं छायावाद काल से प्रारंभ कर रहा हूँ, इस क्रम में आज मैं छायावाद के प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| पंत जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह रचना – वन-वन,…
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उन सियाह बालों में!
जैसे आधी शब के बा‘द चाँद नींद में चौंके, वो गुलाब की जुम्बिश उन सियाह बालों में| बशीर बद्र
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फूल के प्यालों में!
यूँ किसी की आँखों में सुब्ह तक अभी थे हम, जिस तरह रहे शबनम फूल के प्यालों में| बशीर बद्र
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जैसे कोई चुटकी ले!
रात तेरी यादों ने दिल को इस तरह छेड़ा, जैसे कोई चुटकी ले नर्म नर्म गालों में| बशीर बद्र
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नदिया का घना-घना कूल है!
आज मैं विख्यात हिन्दी नवगीतकार स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी की यह रचना – नदिया का घना-घना कूल हैवंशी से बेधो मत प्यारेयह मन तो बिंधा हुआ फूल हैनदिया का घना-घना कूल…
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तेरे शहर वालों में!
सौ ख़ुलूस बातों में सब करम ख़यालों में, बस ज़रा वफ़ा कम है तेरे शहर वालों में| बशीर बद्र
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दिन निकले तो सो लेना
रोते क्यूँ हो दिल वालों की क़िस्मत ऐसी होती है, सारी रात यूँही जागोगे दिन निकले तो सो लेना| बशीर बद्र
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पानी की ये पर्दा-दारी!
मैं ने दरिया से सीखी है पानी की ये पर्दा-दारी, ऊपर ऊपर हँसते रहना गहराई में रो लेना| बशीर बद्र