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उन्ही पत्थरों पे सो लेते!
अगर सफ़र में हमारा भी हम-सफ़र होता, बड़ी ख़ुशी से उन्ही पत्थरों पे सो लेते| बशीर बद्र
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इच्छा शक्ति!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के कुशल व्यंग्यकार, प्रतिष्ठित कवि और मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चक्रधर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – ओ ठोकर !तू सोच रहीमैं…
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उससे लिपट के रो लेते
दुखों का बोझ अकेले नहीं सँभलता है, कहीं वो मिलता तो उससे लिपट के रो लेते| बशीर बद्र
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तन्हाइयों में रो लेते!
किसी की याद में पलकें ज़रा भिगो लेते, उदास रात की तन्हाइयों में रो लेते| बशीर बद्र
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लकीरों से नहीं उलझा!
कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा, मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है| बशीर बद्र
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हवा से पूछना!
तुम्हारे शहर के सारे दिए तो सो गए कब के, हवा से पूछना दहलीज़ पे ये कौन जलता है| बशीर बद्र
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यक़ीं आ जाएगा पलकों
मैं जब सो जाऊँ इन आँखों पे अपने होंट रख देना, यक़ीं आ जाएगा पलकों तले भी दिल धड़कता है| बशीर बद्र
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बहुत ख़ामोश बैठा है!
उदासी आसमाँ है दिल मिरा कितना अकेला है, परिंदा शाम के पुल पर बहुत ख़ामोश बैठा है| बशीर बद्र
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गुज़रना है गुज़र जाएगी
वक़्त नदियों को उछाले कि उड़ाए पर्बत, उम्र का काम गुज़रना है गुज़र जाएगी| निदा फ़ाज़ली