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बुद्धूराम!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों के कवियों की कविताएं और उसमें से चौथा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं श्री राजकुमार कुंभज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी शायद एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री राजकुमार कुंभज जी की…
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जो थी आशियाँ के लिए
पलट के सू-ए-चमन देखने से क्या होगा, वो शाख़ ही न रही जो थी आशियाँ के लिए| साहिर लुधियानवी
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सिर्फ़ दास्ताँ के लिए!
न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए, तिरा वजूद है अब सिर्फ़ दास्ताँ के लिए| साहिर लुधियानवी
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तिरे ख़यालों से दूर!
न सोचने पर भी सोचती हूँ कि ज़िंदगानी में क्या रहेगा, तिरी तमन्ना को दफ़्न कर के तिरे ख़यालों से दूर जा के| साहिर लुधियानवी
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मिलेंगे जो रास्ते में!
कभी मिलेंगे जो रास्ते में तो मुँह फिरा कर पलट पड़ेंगे, कहीं सुनेंगे जो नाम तेरा तो चुप रहेंगे नज़र झुका के| साहिर लुधियानवी
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न दिल को मालूम है!
तुझे भुला देंगे अपने दिल से ये फ़ैसला तो किया है लेकिन, न दिल को मालूम है न हम को जिएँगे कैसे तुझे भुला के| साहिर लुधियानवी
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उमीद की बस्तियाँ!
बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों मोहब्बतों के दिए जला के, मिरी वफ़ा ने उजाड़ दी हैं उमीद की बस्तियाँ बसा के| साहिर लुधियानवी
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बच्चा!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों के कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में आज से मैं चौथा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर कर रहा हूँ और इस क्रम में आज मैं स्वर्गीय अवधेश कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी शायद एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है| लीजिए…
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मैं ने पनाह दी तुझे!
मैं ने पनाह दी तुझे बारिश की रात में, तू जाते जाते आग मिरे घर में डाल दे| कैफ़ भोपाली