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उनको रुला के रह गईं
और तो अहल-ए-दर्द कौन सँभालता भला, हाँ तेरी शादमानियाँ* उनको रुला के रह गईं| *खुश होना फ़िराक़ गोरखपुरी
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शाने हिला के रह गईं!
उफ़ ये ज़मीं की गर्दिशें आह ये ग़म की ठोकरें, ये भी तो बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता* के शाने हिला के रह गईं| *दुर्भाग्य फ़िराक़ गोरखपुरी
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नाम बता के रह गईं!
तारों की आँख भी भर आई मेरी सदा-ए-दर्द पर, उनकी निगाहें भी तिरा नाम बता के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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उषस् (चार)!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय नरेश मेहता जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुबह होने की घटना ऐसी है जो निरंतर होती रहती है लेकिन अत्यंत दिव्य है| नरेश मेहता जी ने इस दिव्य घटना से प्रेरित होकर ‘उषस्’ शीर्षक सेचार रचनाएं लिखी हैं, जिनमें से यह…
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फ़ित्ने जगा के रह गईं!
पूछ न उन निगाहों की तुर्फ़ा करिश्मा-साज़ियाँ, फ़ित्ने* सुला के रह गईं फ़ित्ने* जगा के रह गईं| *उथल-पुथल फ़िराक़ गोरखपुरी
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ख़ाक उड़ा के रह गईं!
तेरे ख़िराम-ए-नाज़* से आज वहाँ चमन खिले, फ़सलें बहार की जहाँ ख़ाक उड़ा के रह गईं| *मतवाली चाल फ़िराक़ गोरखपुरी
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दिल में समा के रह गईं
हुस्न-ए-नज़र-फ़रेब में किस को कलाम था मगर, तेरी अदाएँ आज तो दिल में समा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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आँखें चुरा के रह गईं!
मुझ को ख़राब कर गईं नीम-निगाहियाँ* तिरी, मुझ से हयात ओ मौत भी आँखें चुरा के रह गईं| *चितवन फ़िराक़ गोरखपुरी
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नर्म फ़ज़ा की करवटें!
नर्म फ़ज़ा की करवटें दिल को दुखा के रह गईं, ठंडी हवाएँ भी तिरी याद दिला के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी