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कह दूँगी मैं भी साफ़!
वो बे-वफ़ा जो राह में टकरा गया कहीं, कह दूँगी मैं भी साफ़ कि पहचानती नहीं| अंजुम रहबर
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सारे दिन पढ़ते अख़बार!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर श्री माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| श्री तिवारी जी के कुछ नवगीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ श्री माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत – सारे दिन पढ़ते अख़बार;बीत गया है…
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हज़ारों कारवाँ होंगे!
न हम होंगे न तुम होगे न दिल होगा मगर फिर भी, हज़ारों मंज़िलें होंगी हज़ारों कारवाँ होंगे| मजरूह सुल्तानपुरी