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ख़ता है कि नहीं है!
सच है कि मोहब्बत में हमें मौत ने मारा, कुछ इस में तुम्हारी भी ख़ता है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली
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दवा है कि नहीं है!
बीमार-ए-मोहब्बत की दवा है कि नहीं है, मेरे किसी पहलू में क़ज़ा* है कि नहीं है| *इंसाफ कैफ़ भोपाली
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आँखों को हम ने!
ये देख कर कि उन को है रंगीनियों का शौक़, आँखों को हम ने दीदा-ए-ख़ूँ-बार कर दिया| जोश मलीहाबादी
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मुझ को वो बख़्शते थे!
मुझ को वो बख़्शते थे दो आलम की नेमतें, मेरे ग़ुरूर-ए-इश्क़ ने इंकार कर दिया| जोश मलीहाबादी
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बीमार कर दिया!
दिल कुछ पनप चला था तग़ाफ़ुल* की रस्म से, फिर तेरे इल्तिफ़ात** ने बीमार कर दिया| *उपेक्षा, **उदारता जोश मलीहाबादी
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शुक्रतारा!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की यह कविता – नए दूल्हे-सा सूरज, नववधू सा पीछे-पीछे…
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इंसाँ को और ग़म में!
या रब ये भेद क्या है कि राहत की फ़िक्र ने, इंसाँ को और ग़म में गिरफ़्तार कर दिया| जोश मलीहाबादी
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हुस्न-ए-दोस्त की!
अल्लाह रे हुस्न-ए-दोस्त की आईना-दारियाँ, अहल-ए-नज़र को नक़्श-ब-दीवार कर दिया| जोश मलीहाबादी