आज एक बार फिर से मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर श्री माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
श्री तिवारी जी के कुछ नवगीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ श्री माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत –

सारे दिन पढ़ते अख़बार;
बीत गया है फिर इतवार ।
गमलों में पड़ा नहीं पानी;
पढ़ी नहीं गई संत-वाणी;
दिन गुज़रा बिलकुल बेकार ।
सारे दिन पढ़ते अख़बार ।
पुँछी नहीं पत्रों की गर्द
खिड़की-दरवाज़े बेपर्द
कोशिश करते कितनी बार ।
सारे दिन पढ़ते अख़बार ।
मुन्ने का तुतलाता गीत-
अनसुना गया बिल्कुल बीत
कई बार करके स्वीकार ।
सारे दिन पढ़ते अख़बार ।
बीत गया है फिर इतवार ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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