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अपने पाँव भिगो लेना!
कुछ तो रेत की प्यास बुझाओ जनम जनम की प्यासी है, साहिल पर चलने से पहले अपने पाँव भिगो लेना| बशीर बद्र
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साथ उसी के हो लेना!
उस के बा‘द बहुत तन्हा हो जैसे जंगल का रस्ता, जो भी तुम से प्यार से बोले साथ उसी के हो लेना| बशीर बद्र
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आस को रोकना!
आज मैं विख्यात हिन्दी नवगीतकार स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ ही कविताएं मैंने पहले शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी की यह रचना – आस को रोकनापीड़ा के नगर-द्वारों पर खड़े पहरा देनाअश्रु की राह मेंआए अगर सपन कोई उसे ठुकरा देनाहाथ से छूट…
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लिपट के रो लेना!
रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना, कोई सूखा पेड़ मिले तो उस से लिपट के रो लेना| बशीर बद्र
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ख़ुशियों के बटवारे तक
ख़ुशियों के बटवारे तक ही ऊँचे नीचे आगे पीछे, दुनिया के मिट जाने का डर जितना तेरा उतना मेरा| निदा फ़ाज़ली
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साँसें जितनी मौजें!
साँसें जितनी मौजें उतनी सब की अपनी अपनी गिनती, सदियों का इतिहास समुंदर जितना तेरा उतना मेरा| निदा फ़ाज़ली
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आँसू सपना चाहत!
हर जीवन की वही विरासत आँसू सपना चाहत मेहनत, साँसों का हर बोझ बराबर जितना तेरा उतना मेरा| निदा फ़ाज़ली
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गेहूँ चावल बाँटने वाले!
गेहूँ चावल बाँटने वाले झूटा तौलें तो क्या बोलें, यूँ तो सब कुछ अंदर बाहर जितना तेरा उतना मेरा| निदा फ़ाज़ली
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जितना तेरा उतना मेरा!
एक ही धरती हम सब का घर जितना तेरा उतना मेरा, दुख सुख का ये जंतर-मंतर जितना तेरा उतना मेरा| निदा फ़ाज़ली
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भटका मेघ!
आज मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कविताएं शायद मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्रीकांत वर्मा जी की यह कविता – भटक गया हूँ—मैं असाढ़ का पहला बादलश्वेत फूल-सी अलका कीमैं पंखुरियों तक छू न सका हूँकिसी शाप से…