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तुम्हारा ज़िक्र नहीं है!
ये कोई और ही किरदार है तुम्हारी तरह, तुम्हारा ज़िक्र नहीं है मिरी कहानी में| राहत इंदौरी
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नदी ने धूप से क्या!
नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में, उजाले पाँव पटकने लगे हैं पानी में| राहत इंदौरी
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दिए पलकों पे रक्खे थे!
सहर तक तुम जो आ जाते तो मंज़र देख सकते थे, दिए पलकों पे रक्खे थे शिकन बिस्तर पे रक्खी थी| राहत इंदौरी
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सागर तट!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी में कवियों के कवि कहलाने वाले स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| शमशेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की यह कविता – यह समन्दर की पछाड़ तोड़ती है…
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हमें वो दिन दिखाए थे!
इन्हीं साँसों के चक्कर ने हमें वो दिन दिखाए थे, हमारे पाँव की मिट्टी हमारे सर पे रक्खी थी| राहत इंदौरी
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मैं अपना अज़्म लेकर!
मैं अपना अज़्म* लेकर मंज़िलों की सम्त निकला था, मशक़्क़त हाथ पे रक्खी थी क़िस्मत घर पे रक्खी थी| *संकल्प राहत इंदौरी
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तुम्हारी याद थी जो!
हमारे ख़्वाब तो शहरों की सड़कों पर भटकते थे, तुम्हारी याद थी जो रात भर बिस्तर पे रक्खी थी| राहत इंदौरी
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ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी!
तुम्हारे नाम पर मैंने हर आफ़त सर पे रक्खी थी, नज़र शो’लों पे रक्खी थी ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी| राहत इंदौरी
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चाँदनी का बिस्तर हो!
ये क्या कि रोज़ वही चाँदनी का बिस्तर हो, कभी तो धूप की चादर बिछा के सो लेते| बशीर बद्र
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इस तरफ़ भी हो लेते!
तुम्हारी राह में शाख़ों पे फूल सूख गए, कभी हवा की तरह इस तरफ़ भी हो लेते| बशीर बद्र