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चलिए मिल आते हैं!
शाहज़ादे से मुलाक़ात तो ना-मुम्किन है, चलिए मिल आते हैं चल कर किसी दरबारी से| राहत इंदौरी
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एक ख़ुश्बू सी!
ज़ेहन में जब भी तिरे ख़त की इबारत चमकी, एक ख़ुश्बू सी निकलने लगी अलमारी से| राहत इंदौरी
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आँसू – पृष्ठ २
आज मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के प्रसिद्ध काव्य ‘आँसू’ का एक अंश शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह रचना – घन में सुंदर बिजली-सीबिजली में चपल चमक सीआँखो में…
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अपनी हर साँस को!
अपनी हर साँस को नीलाम किया है मैं ने, लोग आसान हुए हैं बड़ी दुश्वारी से| राहत इंदौरी
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शोलों से चिंगारी से!
जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से, फूल इस बार खिले हैं बड़ी तय्यारी से| राहत इंदौरी
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आँगन में न दीवार उठे!
मिरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे, मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले| राहत इंदौरी
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मिरे बाज़ू रख ले!
तुझ को अन-देखी बुलंदी में सफ़र करना है, एहतियातन मिरी हिम्मत मिरे बाज़ू रख ले| राहत इंदौरी
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तो ख़ुश्बू रख ले!
वो कोई जिस्म नहीं है कि उसे छू भी सकें, हाँ अगर नाम ही रखना है तो ख़ुश्बू रख ले| राहत इंदौरी
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सोने की तराज़ू रख ले!
तू जो चाहे तो तिरा झूट भी बिक सकता है, शर्त इतनी है कि सोने की तराज़ू रख ले| राहत इंदौरी
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मिरे आँसू रख ले!
इसे सामान-ए-सफ़र जान ये जुगनू रख ले, राह में तीरगी होगी मिरे आँसू रख ले| राहत इंदौरी