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मैं तो इक फूल की!
तू ने अब तक मुझे काँटों के सिवा कुछ न दिया, मैं तो इक फूल की मानिंद खिला हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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क्या देख रहा हूँ तुझ में!
बा-वफ़ाई की अदा पाने लगा हूँ तुझ में, ऐ जफ़ा-दोस्त ये क्या देख रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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चेहरे !
आज एक बार फिर मैं विख्यात हिन्दी साहित्यकार एवं श्रेष्ठ कवि श्री रामदरश मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह रचना – आपके संगमरमरी मकान का दरवाज़ापारदर्शी शीशे का हैउसमें से…
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नज़्मों के उनवानों पर!
शेर तो उन पर लिक्खे लेकिन औरों से मंसूब किए, उन को क्या क्या ग़ुस्सा आया नज़्मों के उनवानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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जब भी उस के पाँव!
और भी सीना कसने लगता और कमर बल खा जाती, जब भी उस के पाँव फिसलने लगते थे ढलवानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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जाने किस का नाम!
सस्ते दामों ले तो आते लेकिन दिल था भर आया, जाने किस का नाम खुदा था पीतल के गुल-दानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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मेरे जलते शानों पर!
शहर के तपते फ़ुटपाथों पर गाँव के मौसम साथ चलें, बूढ़े बरगद हाथ सा रख दें मेरे जलते शानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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फेंक गई है धानों पर!
बरखा की तो बात ही छोड़ो चंचल है पुर्वाई भी, जाने किस का सब्ज़ दुपट्टा फेंक गई है धानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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चलते चलते रुक!
आज भी जैसे शाने पर तुम हाथ मिरे रख देती हो, चलते चलते रुक जाता हूँ सारी की दूकानों पर| जाँ निसार अख़्तर