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धान जब भी फूटता है!
आज एक बार फिर मैं वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ हिन्दी नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – धान जब भी फूटता है गाँव मेंएक बच्चा दुधमुँहा किलकारियाँ…
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झोले में उस के पास!
सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर, झोले में उस के पास कोई संविधान है| दुष्यंत कुमार
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इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू
वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू, मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है| दुष्यंत कुमार
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दर्द के गीत गा सके!
अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल, कौन तिरी तरह ‘हफ़ीज़’ दर्द के गीत गा सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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जिसे समझ में आ सके
इज्ज़*से और बढ़ गई बरहमी-ए-मिज़ाज**-ए-दोस्त, अब वो करे इलाज-ए-दोस्त जिस की समझ में आ सके| *बेबसी, नाराजगी हफ़ीज़ जालंधरी
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मरण-त्योहार!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य जगत में गीतों के राजकुंवर के नाम से प्रसिद्ध रहे और हिन्दी फिल्मों को कुछ अमर गीत देने वाले प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय गोपालदास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…
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हमसे नज़र मिला सके!
शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ, किस की मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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लब न मगर हिला सके!
रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं, दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके| हफ़ीज़ जालंधरी