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पैदाइश के दिन से!
पैदाइश के दिन से मौत की ज़द में हैं, इस मक़्तल में कौन हमें ले आया है| साहिर लुधियानवी
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इंसाँ का ख़ूँ बहाया है!
झूट तो क़ातिल ठहरा इस का क्या रोना, सच ने भी इंसाँ का ख़ूँ बहाया है| साहिर लुधियानवी
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ख़ुशियों का लोभ न दो!
हम को इन सस्ती ख़ुशियों का लोभ न दो, हम ने सोच समझ कर ग़म अपनाया है| साहिर लुधियानवी
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दुख की धूप के आगे!
सदियों से इंसान ये सुनता आया है, दुख की धूप के आगे सुख का साया है| साहिर लुधियानवी
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बहुत बे-ज़बान है!
वो आदमी मिला था मुझे उस की बात से, ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है| दुष्यंत कुमार
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बाबुल तुम बगिया के तरुवर!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी काव्य मंचों पर अपने समय में एक अलग पहचान बनाने वाले कवि स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता –…
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हम को पता नहीं था!
फिस्ले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए, हम को पता नहीं था कि इतनी ढलान है| दुष्यंत कुमार
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धान जब भी फूटता है!
आज एक बार फिर मैं वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ हिन्दी नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – धान जब भी फूटता है गाँव मेंएक बच्चा दुधमुँहा किलकारियाँ…