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सर न मगर उठा सके!
होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम, बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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हम न तुम्हें भुला सके!
हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके, तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके| हफ़ीज़ जालंधरी
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मैं बोल रहा हूँ तुझ में!
बेवफ़ा तेरी ज़बाँ पर ये वफ़ा की बातें, ऐसा लगता है कि मैं बोल रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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है यह पतझड़ की शाम, सखे!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी गीत के शीर्ष कवि स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| बच्चन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की यह रचना – है यह पतझड़ की शाम, सखे! नीलम-से पल्लव टूट गए,मरकत-से…
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ढूँढ रहा हूँ तुझ में!
पास इतना कि तिरी साँस से टकराती है साँस, दूर इतना कि तुझे ढूँढ रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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क्या देख रहा हूँ तुझ में!
तेरे चेहरे से हटाई नहीं जातीं नज़रें, क्या ख़बर देर से क्या देख रहा हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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भूल गया हूँ तुझ में!
तुझ से बिछड़े तो ज़माना हुआ लेकिन अब तक, याद आता है कि कुछ भूल गया हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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देख चुका हूँ तुझ में!
मेरा दावा है कि तू ने भी न देखे होंगे, ऐसे जल्वे कि जो मैं देख चुका हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी
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डूब गया हूँ तुझ में!
तू वो दरिया है कि जिस का कोई साहिल ही नहीं, मैं सफ़ीने की तरह डूब गया हूँ तुझ में| शमीम जयपुरी