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शिकन में रहे!
खुले जो हम तो किसी शोख़ की नज़र में खुले, हुए गिरह तो किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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हल्क़ा-ए-रसन में रहे
न हम क़फ़स में रुके मिस्ल-ए-बू-ए-गुल सय्याद, न हम मिसाल-ए-सबा हल्क़ा-ए-रसन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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जादू मिरे सुख़न में रहे!
मुझे नहीं किसी उसलूब-ए-शाइरी* की तलाश, तिरी निगाह का जादू मिरे सुख़न में रहे| *Style of Poetry मजरूह सुल्तानपुरी
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मिरे जुनूँ की महक!
तू ऐ बहार-ए-गुरेज़ाँ किसी चमन में रहे, मिरे जुनूँ की महक तेरे पैरहन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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आश्वस्त!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ और अपनी तरह के अनूठे हिन्दी कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता – हमरात-भर तैरेंगे और अगरडूब नहीं…
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हसीनों की अंजुमन!
हमें शुऊर-ए-जुनूँ है कि जिस चमन में रहे, निगाह बन के हसीनों की अंजुमन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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हुनर में आ गया हूँ!
छुपा न पाया कभी ख़ुद को अपने शे‘रों में, मैं जो हूँ जैसा हूँ अपने हुनर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी
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भँवर में आ गया हूँ!
ये सोच कर कि न दूँ नाख़ुदा को ये ज़हमत, उतर के कश्ती से ख़ुद ही भँवर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी
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तिरे हाथ की लकीरों में
न आ सका मैं तिरे हाथ की लकीरों में, यही बहुत है तिरी चश्म-ए-तर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी
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अपने घर में आ गया हूँ
उदास हो गया हूँ फिर से इक ज़रा हँस कर, में घूम-घाम के फिर अपने घर में आ गया हूँ| राजेश रेड्डी