Category: Uncategorized
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जितने भी बदनाम हुए!
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया, जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया| जाँ निसार अख़्तर
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उनको प्रणाम!
आज एक बार फिर मैं जनकवि बाबा नागार्जुन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नागार्जुन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन जी की यह कविता- जो नहीं हो सके पूर्ण–काममैं उनको करता हूँ प्रणाम । कुछ कंठित औ’ कुछ लक्ष्य–भ्रष्टजिनके अभिमंत्रित तीर हुए;रण…
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कोई सूरज मिरे!
लम्हा लम्हा रहे आँखों में अँधेरे लेकिन, कोई सूरज मिरे सीने में उभरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
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शहर दर शहर मैं!
मिट गया पर तिरी बाँहों ने समेटा न मुझे, शहर दर शहर मैं गलियों में बिखरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
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कोई साया मिरे बाज़ू से
रास्ते भर कोई आहट थी कि आती ही रही, कोई साया मिरे बाज़ू से गुज़रता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
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चाँद उतरता ही रहा!
रौशनी कम न हुई वक़्त के तूफ़ानों में, दिल के दरिया में कोई चाँद उतरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
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चाँद उतरता ही रहा!
रौशनी कम न हुई वक़्त के तूफ़ानों में, दिल के दरिया में कोई चाँद उतरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
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कोई सँवरता ही रहा!
दीदा ओ दिल में कोई हुस्न बिखरता ही रहा, लाख पर्दों में छुपा कोई सँवरता ही रहा| जाँ निसार अख़्तर
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यहाँ से भी चलें!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठनवगीतकर स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ओम प्रभाकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत- चलें, अब तो यहाँ से भी चलें। उठ गएहिलते हुए रंगीन कपड़ेसूखते।(अपाहिज हैं…
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चाँद की एक दरांती थी
तारों की रौशन फ़सलें और चाँद की एक दरांती थी, साहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की| गुलज़ार