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रेत कभी तन्हाई की!
आँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं, क्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई की| गुलज़ार
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आदत है हरजाई की!
सीने में दिल की आहट जैसे कोई जासूस चले, हर साए का पीछा करना आदत है हरजाई की| गुलज़ार
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आवाज़ किसी सौदाई!
नींद में कोई अपने-आप से बातें करता रहता है, काल-कुएँ में गूँजती है आवाज़ किसी सौदाई की| गुलज़ार
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चाँदनी रात जुदाई की!
तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की, क्यूँ इतनी लम्बी होती है चाँदनी रात जुदाई की| गुलज़ार
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भ्रूण हत्या!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठकवि और सांसद भी रहे श्री उदयप्रताप सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उदयप्रताप जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री उदयप्रताप सिंह जी की यह कविता- उनको भी है जीने का अधिकार उन्हें भी जीने दोदेना…
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सिर्फ़ लफ़्ज़ सुनते हो!
जानता हूँ मैं तुम को ज़ौक़-ए-शाएरी भी है शख़्सियत सजाने में इक ये माहरी भी है, फिर भी हर्फ़ चुनते हो सिर्फ़ लफ़्ज़ सुनते हो उन के दरमियाँ क्या है तुम न जान पाओगे| जावेद अख़्तर