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चाँदनगर लिख जाएगा
तेरा नूर ज़ुहूर सलामत इक दिन तुझ पर माह-ए-तमाम, चाँद-नगर का रहने वाला चाँद-नगर लिख जाएगा| इब्न-ए-इंशा
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वो क्या दर्द बटाएगा!
दीदा ओ दिल ने दर्द की अपने बात भी की तो किस से की, वो तो दर्द का बानी ठहरा वो क्या दर्द बटाएगा| इब्न-ए-इंशा
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पत्थर का बन जाएगा!
हाँ यही शख़्स गुदाज़ और नाज़ुक होंटों पर मुस्कान लिए, ऐ दिल अपने हाथ लगाते पत्थर का बन जाएगा| इब्न-ए-इंशा
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वहशी फूल खिलाएगा!
शहरों को वीरान करेगा अपनी आँच की तेज़ी से, वीरानों में मस्त अलबेले वहशी फूल खिलाएगा| इब्न-ए-इंशा
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सूरज को शरमाएगा!
राज़ कहाँ तक राज़ रहेगा मंज़र-ए-आम पे आएगा, जी का दाग़ उजागर हो कर सूरज को शरमाएगा| इब्न-ए-इंशा
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ये हरे वृक्ष!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज स्वर्गीया शकुंत माथुर जी की एक और कविता शेयर कर रहा हूँ| शकुंत जी की एक रचना मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया शकुंत माथुर जी की यह कविता – ये हरे वृक्षयह…
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तुम उसको बुरे नाम से!
तुम उस को बुरे नाम से यारो न पुकारो, ये नाम उसे बाइस-ए-आज़ार* ही कब था| *Cause Of Trouble क़तील शिफ़ाई
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वो बेज़ार ही कब था!
आवाज़ जो मैं दूँ तो किसी और को छू ले, इस आँख-मिचोली से वो बेज़ार ही कब था| क़तील शिफ़ाई
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ये किरदार ही कब था!
आमों की हसीं रुत के सिवा भी तो वो कूके, लेकिन किसी कोयल का ये किरदार ही कब था| क़तील शिफ़ाई