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आइना देख देख के!
न जाने किस की याद ने ली दिल में गुदगुदी, आइना देख देख के शरमा रहे हैं हम| अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
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किस का इंतिज़ार!
सब अपनी अपनी राह पर आगे निकल गए, अब किस का इंतिज़ार किए जा रहे हैं हम| अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
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सौ सौ उमीदें बाँध के!
तुम ने तो इक निगाह उठाई है इस तरफ़, सौ सौ उमीदें बाँध के इतरा रहे हैं हम| अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
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जाना कहाँ है और!
जाना कहाँ है और कहाँ जा रहे हैं हम, अपनों की रहनुमाई से घबरा रहे हैं हम| अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
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सरिता!
आज एक बार फिर मैं अपने समय में काव्य मंचों पर अपने हिन्दी गीतों के माध्यम से धूम मचाने वाले स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|नेपाली जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी का यह गीत –…
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इक फूल महकता है!
एहसास की डाली पर इक फूल महकता है, ज़ुल्फ़ों के लिए तुम ने इक रोज़ चुना होता| साग़र सिद्दीक़ी
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बे-राहनुमा होता!
हर गाम पे काम आते ज़ुल्फ़ों के तिरी साए, ये क़ाफ़िला-ए-हस्ती बे-राहनुमा होता | साग़र सिद्दीक़ी
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मेला सा लगा होता!
तुम हाल-ए-परेशाँ की पुर्सिश के लिए आते, सहरा-ए-तमन्ना में मेला सा लगा होता| साग़र सिद्दीक़ी
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ख़ामोश मोहब्बत का!
हर चीज़ ज़माने की आईना-ए-दिल होती, ख़ामोश मोहब्बत का इतना तो सिला होता| साग़र सिद्दीक़ी