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पागल नहीं होते!
उश्शाक़* के मानिंद कई अहल-ए-हवस भी, पागल तो नज़र आते हैं पागल नहीं होते| *आशिक़ अहमद फ़राज़
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ओझल नहीं होते!
कैसे ही तलातुम हों मगर क़ुल्ज़ुम-ए-जाँ में, कुछ याद-जज़ीरे हैं कि ओझल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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जल-थल नहीं होते!
शाइस्तगी-ए-ग़म* के सबब आँखों के सहरा, नमनाक तो हो जाते हैं जल-थल नहीं होते| *दुख सहने की सुशीलता अहमद फ़राज़
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चाँदनी!
आज मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार तथा अज्ञेय जी द्वारा संपादित प्रमुख काव्य संकलन ‘तारसप्तक’ में भी शामिल कवि स्वर्गीय राम विलास शर्मा जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राम विलास शर्मा जी की यह कविता – चांदी की झीनी…
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कुछ मुश्किलें ऐसी हैं!
कुछ मुश्किलें ऐसी हैं कि आसाँ नहीं होतीं, कुछ ऐसे मुअम्मे हैं कभी हल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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करिश्मे भी अजब हैं!
अंदर की फ़ज़ाओं के करिश्मे भी अजब हैं, मेंह टूट के बरसे भी तो बादल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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मगर कल नहीं होते!
ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते, जो आज तो होते हैं मगर कल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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ख़ुदाइयाँ क्या क्या!
हम ऐसे सादा-दिलों की नियाज़-मंदी से, बुतों ने की हैं जहाँ में ख़ुदाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सिखाईं तुम ने हमें!
सितम पे ख़ुश कभी लुत्फ़-ओ-करम से रंजीदा, सिखाईं तुम ने हमें कज-अदाइयाँ* क्या क्या| *बेवफाई फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जग-हँसाइयाँ क्या क्या
पहुँच के दर पे तिरे कितने मो‘तबर ठहरे, अगरचे रह में हुईं जग-हँसाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़