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पीताभ किरण पंछी!
आज से मैं, अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करना प्रारंभ कर रहा हूँ और इस क्रम में सबसे पहले मैं स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक और कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत…
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वो चाँद-सितारों का!
उस ने तो सदा पूजे हैं उड़ते हुए जुगनू, वो चाँद-सितारों का परस्तार ही कब था| क़तील शिफ़ाई
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वफ़ादार ही कब था!
क्या इस का गिला कीजे उसे प्यार ही कब था, वो अहद-ए-फ़रामोश वफ़ादार ही कब था| क़तील शिफ़ाई
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मदहोशी में एहसास के
मद-होशी में एहसास के ऊँचे ज़ीने से गिर जाने दे, इस वक़्त न मुझ को थाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| क़तील शिफ़ाई
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वक़्त नहीं है बातों का!
ये वक़्त नहीं है बातों का पलकों के साए काम में ला, इल्हाम कोई इल्हाम* कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| *ईश्वरीय प्रेरणा क़तील शिफ़ाई
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तुम्हीं हो क्या बन्धु वह!
आज मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार तथा तारसप्तक और अन्य सप्तकों के माध्यम से अनेक कवियों को बड़े आधार पर सामने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय…
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देख चुका हूँ पहले भी!
गो देख चुका हूँ पहले भी नज़्ज़ारा दरिया-नोशी* का, एक और सला-ए-आम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| *OverDrinking क़तील शिफ़ाई
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देख सितारों के मोती!
वो देख सितारों के मोती हर आन बिखरते जाते हैं, अफ़्लाक* पे है कोहराम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| *Sky क़तील शिफ़ाई
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रात गुज़रने वाली है!
इक जाम खनकता जाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है, इक होश-रुबा इनआ‘म कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| क़तील शिफ़ाई