अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज स्वर्गीया शकुंत माथुर जी की एक और कविता शेयर कर रहा हूँ|
शकुंत जी की एक रचना मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया शकुंत माथुर जी की यह कविता –

ये हरे वृक्ष
यह नई लता
खुलती कोंपल
यह बन्द फलों की कलियाँ सब
खुलने को, खिलने को, झुकने को होतीं
स्वयं धरा पर।
धूल उड़ रही
धूल बढ़ रही,
जबरन रोकेगी यह राह
अपनी धाक जमाकर
ज़ोर जमाकर आँधी
तोड़ रही कुछ हरे वृक्ष
सब नई लता —
ये परवश हैं
इस धरती की बात रही यह
कहीं उगा दे
ऊँचे पर, नीचे पर, पत्थर पर,
पानी में।
ये उपकारी हरे वृक्ष
यह नई लता
खुलती कोंपल
खुलने पर, खिलने पर, पकने पर
झुक जाएँगी स्वयं धरा पर
फिर से उगने को कल
नए रूप में।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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