Category: Uncategorized
-
झोंके जो लग रहे हैं!
झोंके जो लग रहे हैं नसीम-ए-बहार के, जुम्बिश में है क़फ़स भी असीर-ए-चमन के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी
-
फूल झर गए!
आज से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर कर यहा हूँ और इस क्रम में आज स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| कीर्ति जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी का यह नवगीत…
-
दाग़-ए-कुहन के साथ!
किस ने कहा कि टूट गया ख़ंजर-ए-फ़रंग, सीने पे ज़ख़्म-ए-नौ भी है दाग़-ए-कुहन* के साथ| *विरह का दुख मजरूह सुल्तानपुरी
-
उसी बाँकपन के साथ!
सर पर हवा-ए-ज़ुल्म चले सौ जतन के साथ, अपनी कुलाह कज है उसी बाँकपन के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी
-
नए पैरहन के साथ!
दुश्मन की दोस्ती है अब अहल-ए-वतन के साथ, है अब ख़िज़ाँ चमन में नए पैरहन के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी
-
ख़ुद को तसल्ली देना!
ख़ुद को तसल्ली देना कितना मुश्किल होता है, कोई क़ीमती चीज़ अचानक जब भी खोती है| शहरयार
-
एक भावना!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज स्वर्गीय हरिनारायण व्यास जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| हरिनारायण जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिनारायण व्यास जी की यह कविता – इस पुरानी जिन्दगी की जेल…
-
यादों के सैलाब में
यादों के सैलाब में जिस दम मैं घिर जाता हूँ, दिल-दीवार उधर जाने की ख़्वाहिश होती है| शहरयार