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शोख़ पत्ते ने कहा!
मैं न हूँगा तो ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी, शोख़ पत्ते ने कहा शाख़ से मुरझाते हुए| गुलज़ार
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हम ने तो रात को!
हम ने तो रात को दाँतों से पकड़ कर रक्खा, छीना-झपटी में उफ़ुक़ खुलता गया जाते हुए| गुलज़ार
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कुछ भँवर डूब गए!
तुझको देखा है जो दरिया ने इधर आते हुए, कुछ भँवर डूब गए पानी में चकराते हुए| गुलज़ार
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हम सा कोई आवारा!
सहरा में बगूला भी है ‘मजरूह’ सबा भी, हम सा कोई आवारा-ए-आलम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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मैंने अपना दिन बिताया- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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तिरा ग़म तो नहीं है!
अब कारगह-ए-दहर* में लगता है बहुत दिल, ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है| Prison of The World मजरूह सुल्तानपुरी
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शबनम तो नहीं है!
चाहे वो किसी का हो लहू दामन-ए-गुल पर, सय्याद ये कल रात की शबनम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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हर-चंद बहाराँ का!
कुछ ज़ख़्म ही खाएँ चलो कुछ गुल ही खिलाएँ, हर-चंद बहाराँ का ये मौसम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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महरम तो नहीं है!
गो रात मिरी सुब्ह की महरम तो नहीं है, सूरज से तिरा रंग-ए-हिना कम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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राहज़न के साथ!
‘मजरूह’ क़ाफ़िले की मिरे दास्ताँ ये है, रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी