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हुआ ख़ाली सदाओं से!
उगा सब्ज़ा दर-ओ-दीवार पर आहिस्ता आहिस्ता, हुआ ख़ाली सदाओं से नगर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी
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गहरे-गहरे से पदचिह्न!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के ख्यातिलब्ध हस्ताक्षर माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ और हाँ आज पहली बार उनके नाम के साथ ‘स्वर्गीय’ जोड़ना पड़ेगा क्योंकि आज सुबह ही उनके निधन का दुखद समाचार प्राप्त हुआ| माहेश्वर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए…
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अपना पता देना चाहिए
गुम हो चले हो तुम तो बहुत ख़ुद में ऐ ‘मुनीर’, दुनिया को कुछ तो अपना पता देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी
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डरा देना चाहिए!
इक तेज़ रअ‘द* जैसी सदा हर मकान में, लोगों को उन के घर में डरा देना चाहिए| *बादलों के गरजने की आवाज़ मुनीर नियाज़ी
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मिलती नहीं पनाह हमें!
मिलती नहीं पनाह हमें जिस ज़मीन पर, इक हश्र उस ज़मीं पे उठा देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी
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जला देना चाहिए!
इस शहर-ए-संग-दिल को जला देना चाहिए, फिर उस की ख़ाक को भी उड़ा देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी
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शब भर बे-आराम हुए!
‘इंशा’-साहिब पौ फटती है तारे डूबे सुब्ह हुई, बात तुम्हारी मान के हम तो शब भर बे-आराम हुए| इब्न-ए-इंशा
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जी को दुखाना क्या!
उन से बहार ओ बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या, जिन को एक ज़माना गुज़रा कुंज-ए-क़फ़स में राम हुए| इब्न-ए-इंशा
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मिरगी पड़ी!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी अमिट छाप डालने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह कविता – अच्छा…
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चाह की राह दिखाकर!
शौक़ की आग नफ़स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो, चाह की राह दिखा कर तुम तो वक़्फ़-ए-दरीचा-ओ-बाम हुए| इब्न-ए-इंशा