Category: Uncategorized
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रंग क्या कोई बचा है!
अब ज़मीं क्यूँ तेरे नक़्शे से नहीं हटती नज़र, रंग क्या कोई बचा है इस में भरने के लिए| शहरयार
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चाँद से जब भी कहा!
इस बुलंदी ख़ौफ़ से आज़ाद हो उस ने कहा, चाँद से जब भी कहा नीचे उतरने के लिए| शहरयार
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आसमाँ कुछ भी नहीं!
आसमाँ कुछ भी नहीं अब तेरे करने के लिए, मैं ने सब तय्यारियाँ कर ली हैं मरने के लिए| शहरयार
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सौ-सौ प्रतीक्षित पल गए!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| शेरजंग जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का यह नवगीत – सौ-सौ प्रतीक्षित पल गएसारे भरोसे छल गएकिरणें हमारे गाँव मेंख़ुशियाँ नहीं लाईं ।…
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सफ़र आहिस्ता आहिस्ता!
‘मुनीर’ इस मुल्क पर आसेब* का साया है या क्या है, कि हरकत तेज़-तर है और सफ़र आहिस्ता आहिस्ता| *Distress मुनीर नियाज़ी
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मिरे बाहर फ़सीलें थीं!
मिरे बाहर फ़सीलें थीं गुबार-ए-ख़ाक-ओ-बाराँ की, मिली मुझ को तिरे ग़म की ख़बर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी
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मकान-ए-ख़ाक में लाई!
चमक ज़र की उसे आख़िर मकान-ए-ख़ाक में लाई, बनाया साँप ने जिस्मों में घर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी
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लहू के रंग लाने का!
बहुत ही सुस्त था मंज़र लहू के रंग लाने का, निशाँ आख़िर हुआ ये सुर्ख़-तर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी
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घिरा बादल ख़मोशी से!
घिरा बादल ख़मोशी से ख़िज़ाँ-आसार बाग़ों पर, हिले ठंडी हवाओं में शजर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी
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हुआ ख़ाली सदाओं से!
उगा सब्ज़ा दर-ओ-दीवार पर आहिस्ता आहिस्ता, हुआ ख़ाली सदाओं से नगर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी